
*मां*
जिंदगी की बस शुरुवात हुई थी
एक ऐसा आंचल जो छुपाता मुझे हर और
धूप की सेक भी देता और झुलस से भी बचाता
वो ढके हुए है मुझे हर और
जब भूख से मैं कुलबुलाता
वो पिलाती अपना दूध और उसका गुनगुना कर देता मदहोश
मैं सो जाता यूंही दूध पीते पीते
और वो गले लगा मेरा मूंह चूमती
मैं भी झूमता उसके प्यार में सब और

धीरे धीरे जब बड़ा हुआ
वो मुझे लाड करती
खुद की परेशानी भुला
हर पल मुझे प्यार करती मेरा खयाल रखती
पता नही है वो है “कौन”
मुझ से वो मां बुलवाती
जब पहली बार कहा ” मां”वो ऐसे झूमे
मानो ईश्वर ने सब कुछ दे दिया
गले से लगा लिया मुझे
कहती नही चाहिए मेरे अलावा कुछ और
– अंकित सेंगर (#kavyakahani )
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