बूढ़ी आंखो का इंतजार

*बूढ़ी आंखो का इंतजार*

टूटी हुई झोपड़ी में वो रहती थी
एक लंबा अरसा हो गया उसे कोई मिलने को ना आया था

वो रोज वही इंतजार करती उनके आने का
सालो का इंतजार पर कोई नहीं लेने आया था

कहा उनसे की चलो हमारे साथ
वो बोली बेटा बोल के गया था कुछ दिन में लेने आता हूं



सालो गुजर गए इस बात को
वो बूढ़ी आखें अंकित आज भी उनके इंतजार में

हम दोनो ही जानते थे
जो चला गया वो अब लौट के नही आने वाला था

नही आने वाला था

– अंकित सेंगर
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कभी हसता हूं कभी रोता हूं

*कभी हसता हूं कभी रोता हूं*

रोते हुए आते है सब
हसता हुआ जो जाएगा

अपने मुकदर को खुद लिखेगा वो
गमों में भी मुस्कुराना सिखाएगा



ऐसे ही मुस्कान को अंकित करने यहा वहा फिरता हूं
नुकड़ किनारे बैठे फकीर को देख असमंजस में बैठा हूं

पर जब ना रहा गया पूछा उस फकीर से
क्यों परेशान इस जहां से , वो बोला

अपने कर्म से जब भला करू तो हंसता हूं
और बेबस पर वो रहम करे इसके लिए रोता हूं

अंकित सेंगर. (#kavyakahani)
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तुम कौन होती हो

*तुम कौन होती हो*

तुम कौन होती हो बताने वाली
ये बोल उसने अपनी मां को दरकिनार किया

समय का चलन बदल गया है
उसकी मां ने चुपचाप आसूं पोछे


और नज़रे नीचे कर कमरे से बाहर चली गई
अब उसने नहीं कोई सवाल किया

बड़ी हो रही है उसकी लाडली
ना रोक सकी ममता से विवश हो
अंकित बस एक छोटा सा सवाल किया

जवाब में अपनी बेटी के ऐसे शब्दो को सुन
नम आंखों से अपने अतीत को याद किया

सालो पहले जब वो भी जवानी की दहलीज पे आई थी
उसने अपनी मां को भी ऐसी ही खोटी बाते सुनाई थी

समय के उसी चलन को दुबारा देख
उसका मन सहम गया

कैसे उसकी एक गलती से
उसका गर्भ ठहर गया



बिनबिहाई मां बना प्रेमी भी संग छोड़ गया
पूरी तरह से हो चुकी थी खंडित वो

तब उसी मां ने संभाला
जिसे उसने हर घड़ी अपमानित किया

आखिर में आसू पौछ
उसे उसके सवाल का जवाब मिल गया

“मैं मां हूं”
प्यार से देखा उसे और दिल से माफ किया

अंकित सेंगर (#kavyakahani )
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मां

*मां*
जिंदगी की बस शुरुवात हुई थी
एक ऐसा आंचल जो छुपाता मुझे हर और

धूप की सेक भी देता और झुलस से भी बचाता
वो ढके हुए है मुझे हर और

जब भूख से मैं कुलबुलाता
वो पिलाती अपना दूध और उसका गुनगुना कर देता मदहोश

मैं सो जाता यूंही दूध पीते पीते
और वो गले लगा मेरा मूंह चूमती
मैं भी झूमता उसके प्यार में सब और



धीरे धीरे जब बड़ा हुआ
वो मुझे लाड करती

खुद की परेशानी भुला
हर पल मुझे प्यार करती मेरा खयाल रखती
पता नही है वो है “कौन”

मुझ से वो मां बुलवाती

जब पहली बार कहा ” मां”वो ऐसे झूमे
मानो ईश्वर ने सब कुछ दे दिया

गले से लगा लिया मुझे
कहती नही चाहिए मेरे अलावा कुछ और

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जिम्मेवारिया और बचपन

जिंदगी की तलाश शुरू ही हुई थी
जिम्मेवारियो का बोझ आ गया

सपने सजोए थे आसमां को छूने के
पर मिडिल क्लास और लोवर क्लास का सपना

क्या सपना साहब !



जिम्मेवारिया आई और सपने
बोझ तले दब गए

जहा बाकी बच्चे ,बच्चे थे
पर हम उम्र से सियाने हो गए

कुछ की किस्मत हम में अच्छी
कुछ आसमां को कुछ सड़क की ख़ाक छू गए

अंकित हम सभी के सपने
कुछ के नाम फलक पे कुछ जिम्मेवारियो के संग हो गए

कोई गिला नहीं क्या हुआ अतीत में, साहेब !
बस वो थोड़े बाद में और हम थोड़े पहले जवां हो गए

– अंकित सेंगर (#kavyakahani)
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