अनंत प्रेम बस एक परिकल्पना

*अनंत प्रेम बस एक परिकल्पना*

मिला था उससे, उसे जीवन संगनी बनाने को
रजा मंदी सबने, शुरू हमारे प्रेम का संस्कार हुआ

मैने हर पल उसका होने का वचन दिया
पर शायद उसे मुझ से नही कोई प्यार हुआ

उसने अनंत प्रेम को नही शारीरिक सुख को महत्ता दी
प्रेम या हवस इन दो भावो का टकरार हुआ


उसने मेरे शारीरिक ढांचे को शर्म का कारण बताया
ना जाने क्यों फिर भी मुझे उससे प्यारा हुआ

ये रिश्ता बीच मझधार में टूटने को
मेरे प्यार पर अंकित नाम उसका पर शायद उसे मुझ से नहीं प्यार हुआ

युग का परिवर्तन देखो इस जग का
पत्निव्रता पति outdated हो गए

क्योंकि अब लोगो ने प्रेम का नही
हवस का रस पान किया


अनंत प्रेम बस एक परिकल्पना
शारीरिक सुख को ही समाज ने प्रेम का नया मापदंड मान लिया

सच्चे प्रेम का मापदंड मान लिया

अंकित सेंगर
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बूढ़ी आंखो का इंतजार

*बूढ़ी आंखो का इंतजार*

टूटी हुई झोपड़ी में वो रहती थी
एक लंबा अरसा हो गया उसे कोई मिलने को ना आया था

वो रोज वही इंतजार करती उनके आने का
सालो का इंतजार पर कोई नहीं लेने आया था

कहा उनसे की चलो हमारे साथ
वो बोली बेटा बोल के गया था कुछ दिन में लेने आता हूं



सालो गुजर गए इस बात को
वो बूढ़ी आखें अंकित आज भी उनके इंतजार में

हम दोनो ही जानते थे
जो चला गया वो अब लौट के नही आने वाला था

नही आने वाला था

– अंकित सेंगर
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