
अभिमान से परिपूर्ण होकर हर हद पार कर बैठी थीं वह,
लोभ के वशीभूत होकर एक गहन अपराधी बन चुकी थीं वह।
उसके क्रोध की कोई सीमा न थीं,
डाह की ज्वाला में झुलसकर पल-पल जल रहीं थीं।

आलस्य की गहराईयो में डुबकर वो अपना जीवन यापन कर रहीं थीं,
कामोद्दीपक की गिरफ़्त में आकर वह अपना अस्तित्व खो चुकी थीं।

भक्षक उसका भक्षण करतें और समय की दास्तान बदल रहीं थीं,
असीम प्रयासो के उपरांत भी उसके जीवन में अब पुनः सूरज का प्रकाश भी उसके जीवन को प्रकाशित नहीं कर सकतीं थीं।
दिपशीखा अग्रवाल
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