
*मर्द बने रहना आसान होता है।*
बेटा होता है, दोस्त होता है,
मेहबूब होता है, पति होता है,
बाप होता है।
कई किरदारों में वह एक ही होता है।
मर्द बने रहना आसान होता है।
मसरूफियत से घिरा हो,
या क़ुर्सी बैठा हो।
अपने लिये वक़्त निकले,
तो सवालों का मेला होता है।
जवाब उसे हर हाल में देना होता है।
मर्द बने रहना आसान होता है।
सफाई दे तो अड़ियल है,
न दे तो खुदगर्ज़ होता है।
लड़े तो बत्तमीज़ कहलाए,
चुप रहे गुनेहगार क़रार होता है।

उसके लिखे को कौन पढता है।
मर्द बने रहना आसान होता है।
रणभूमि आज भी उसकी,
घर के बाहर होती है।
सब कुछ सेह कर, सुन्न कर भी,
मुस्कुराते हुए घर लौटता है।
फिर भी वक़्त का इलज़ाम सर पर उठता है,
मर्द बने रहना आसान होता है।
ज़िन्दगी गुज़र जाती है,
नस्ल उसकी आगे बढ़ती है।
बदन झुका हुआ,
झुर्रियों से भरा होता है।
तजुर्बा हमराह लिये, सांसें गिन रहा होता है।
पुछलो उससे एक बार ही सही,
क्या मर्द बने रहना आसान होता है?
*ANUP SHAH*

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