
राहत ना मिली
भट़कता रहा मैं बनज़ारों सा कि ख़ुदा की राहत ना मिली,
कितना चाहा था उस बेवफ़ा को की उसकी चाहत ना मिली।
रह गया मैं आवारा कि अब किसी की ईबाद़त भी ना मिली,
ख़्वाब में आते है पर उनको पाने की ख्व़ाहिश ना मिली।
जुड़ा था मेरा मन बस उनके ही ख्य़ल से की की रवाय़त ना मिली,
रूह बन गएं थे वो मेरी पर मुझे उनकी आद़त भी ना मिली।
सपनें जो करने थे उनके मुझे की उनकी ईज़ाजत ना मिली,
याद़ बनकर अंकित रह गई वो मेरी, मुझे उनकी रूसवाईं भी ना मिली।
भट़कता रहा मैं बनज़ारों सा कि ख़ुदा की राहत ना मिली,
कितना चाहा था उस बेवफ़ा को की उसकी चाहत ना मिली।
अब तो भूल चुके है वो मुझे कि उनकी नफ़रत ना मिली,
भट़कता रहा मैं बनज़ारों सा कि मुझे ख़ुदा की राहत भी ना मिली।

Bhavesh Parmar
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