
* ये मन *
यूं तो शांत रहता है ये चितवन मैं
ना जाने क्यों नटखट हो गया ये मन
भोर होते ही कुछ नया खेल सोचने लगता
नटखट ये मन
कभी कभी ये उदास होता
कभी उड़ेल लेता खुद पे प्रेम रंग
ना समझ आए की क्या चाहता ये
दूर होने पे भी पास ले आए
और पास होके भी दूर
कितना विचित्र है ये मन
अंकित है सब रस इसमें
प्रेम चुनो या वियोग ,ये है तुम्हारा चयन
बेहतर है सच्चा प्रेम मिल जाए
वरना संयोग में भी वियोग की पीड़ा दे
ये मन
–अंकित सेंगर
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