आइनेमहोबत

*आइने -ए -महोबत*

जब कभी लगे शक लगे महोबत पे मेरी
दिल पे हाथ रख तू खुद से पूछना

क्या वाकई महोबत नहीं है मुझे
या तू सिर्फ अपना दिल बहलाने को बहाना दे रही

माना मैं अच्छा नही प्यार जताने में
शक है तो देख मेरी इन आंखो में
क्या इनमे तू अपने लिए प्यार नही देख रही

ऐसा नहीं की मैं perfect हूं
कमियां मुझ में भी बहुत
पर क्या तू मेरी महोबत की सचाई को नही देख रही

तेरे जिस्म की चाहत में प्यार दिखाने वाले मिलेगे बहुत
पर सच्चे प्यार वाली नज़रे , दुबारा न मिलेगी

आइने जैसी मेरी मोहोबत
जितना प्यारा तू करेगी
उससे ज्यादा ही तू मेरे प्यार में डूबी रहेगी

अगर फिर भी खामी लगे मुझ में
तो बेशक तू बहला ले अपना दिल
मेरी सच्ची महोबत तू हमेशा के लिए खो देगी

जिस्म की भूख है जब जवानी ढलेगी
वो फरेबी महोबत भी छोड़ जायेगी

तू सच्चे प्यार को तरसेगी
चेहरे पे तो मुस्कान होगी
पर अंदर से हर पल मर रही होगी

महोबात–ए–आइने में
खुद ना अंकित कर, तू खुद को बेवफा
एक बार टूटी जो ये सच्ची महोबात

दुनिया की नजर में तो तू जिंदा होगी
पर तेरी रूह हर पल मर रही होगी
तेरी रूह हर पल मर रही होगी

अंकित सेंगर
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