
*एकांत उपवन में*
यूं तो रहा हूं एकांत वन में
प्रकृति का संगम रहा मुझ से दूर
न जा सका प्रेम उपवन में
बस मेरी आराध्या देवी ही है
मेरे लिए प्रेम की डोर
उनके ही एक अवतरण के नाम
किसी को मैने अपने अंतर का भेद खोल दिया
उस पगली ने सब कुछ देखा
बस प्रेम रूपी मोती को छोड़ दिया
वो रमण करती रही उस उपवन के हर घटक
हर पल भ्रमित, प्रेम छोड़, हर वस्तु पर गौर किया
वो साधक बैठा अपनी देवी को सुमिरे
बस उस देवी के अतरिक्त
उसने उस कोयल को
अपने अंतर में स्थान दिया
वो पगली समझी न इस प्रेम को
साधक के अंतर पे प्रश्न किए
अंतर के प्रेम को नजरंदाज किया
वो मुस्कुराता रहा
उस अनदेखेपन में भी
वो पहली थी जिसे उसने,
अपनी आराध्या देवी के अतरिक्त
अपनी आत्मा में साध्य किया
वो पगली भागती रही मृग मर्चिका जैसे
अंकित तो था वो अंतर में
न जाने क्यों
उस पगली ने समाज की सुनी
अनधेका किया साधक को उसके भद्रा रूप पे
जिसने उसे पहली नजर में उसे प्यार किया
जिसने उसे पहली नजर में
प्यार किया
अंतर– मन ,भद्रा– देखने में बुरा

– अंकित सेंगर
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