
सरहद से बुलावा
जाना ही था
मैं उदास
पर क्या करू बुलावा आया
जाना ही था
सब लोग उदास है
खास तौर से वो
उसकी नम आंखे
रुकना चाहता हूं
पर फर्ज़ निभाना भी तो था
अगर न बुलावा आता तो शायद
आज एक नया रिश्ता। होता
अपनो से ज्यादा
मुझे उनसे अपनापन निभाना
ही तो था
फर्ज़ है इस मिट्टी से
इसी की खातिर तो
ये जन्म लिया
अब इस मिट्टी का कर्ज
भी चुकाना भी तो था
कोई दुःख नहीं ये सुख है मेरा
कोई गम नही
ये है लक्ष्य मेरा
वो समझ गई की
की ये सफर जरूरी है
वो जान गई
मेरी मंजिल
मेरी जिंदगी से जरूरी है
उसने अपने आसू पोछ
मुझे गले लगा लिया
कहा जाओ सरहद पे
और अपनी तस्वीर को
मेरे बटुए में लगा दिया
कहा वो इंतजार करेगी
हमारी शादी का
अपने आसू छुपा
मेरे गले लगी रही
मेरी हिम्मत बढ़ाई
मेरी साथी बनी रही
प्यार से चूम मेरा हाथ
मेरे सही सलामत
रहने और घर जल्द वापस
लोटने का वादा लिया
जब चलने लगा तो
उसकी ये बात दिल को छू गई
” प्यार में मैने हर खुशी दी
पर अब मेरा इस मिट्टी का
फर्ज़ निभाना जरूरी था”
–अंकित सेंगर
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