
थोड़ी देर
तू थोड़ी देर रुक जा ,
क्या पता तुझे मेरा दर्द समझ आ जाए |
कि तेरे बिन दिल काँपता है नफ़रत की आँधी में |
तू थोड़ी देर रुक जा,
क्या पता ये अंगारो का रास्ता को हम बना दे कश्मीर जैसा स्वर्ग |
जिसे देख रक्त के व्यापारी हो जाए फनाह अमन की शोर में |
तू थोड़ी देर रुक जा ,
क्या पता मुखातिब हो जाऊ तेरी बदमाशियों से ,
जिसे देखने के लिए तोडा मैंने अपना मौन व्रत |
जो मिली थी मुझे सुस्त ज़िन्दगी जैसे चक्रवात से |
तू थोड़ी देर रुक जा ,
वादा रहा कि इस सूफी रंग से मैं बुनूंगा भरोसे का ऐसा स्वेटर |
जिसे चीर न पाएगी बेवफाई जैसा क्रूर मौसम |
Vibhor Bijoy

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